एक कविता…

कल रात उनका खत आया खत में थी एक कविता देर तक उसे पढ़ती रही उनके मंसूबों को टटोलती रही  खुशबू से उस खत के घर महक उठा मानो अभी अभी बरसात होके गया हो रात भर उनकी कविता करवटें लेती रही उनकी कमी गहराती गयी और मैं सुकून से परे रही भोर हुई तो…

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मुकाम

ज़िन्दगी अक्सर ऐसे मुकाम पर ले आती हैजहां से आगे बढ़ना मुश्किल लगने लगता हैपीछे छूटे हुए रास्तेसवाल करने लगते हैंतीखे तीर मारने लगते हैंमानो मज़ाक बना रहे होंनुक्स निकाल रहे होंकदम यह सोचके लड़खड़ाने लगते हैं कीजो आज अपने हैंकहीं वह भी छोड़ कर चले गए तोऐसे में कहाँ जायेंगेकिस दरवाज़े खटखटाएंगेकौन अपनाएगागलतियों को…

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Micropoetry#82

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घर घर में कैद हैं…

घर घर में कैद हैंमाँ की बेताबियाँ अनेक हैंबाबा की तन्हाईयाँ ढेर हैंदीदी के सपने सरफ़रोश हैं…*घर घर में कैद हैंख्वाहिशें बेचैन हैंदिल में रंजिशें खामोश हैंआपसी शिकवे हर रोज़ हैं…*घर घर में कैद हैंहसरतें बेख़ौफ़ हैंमनमर्ज़ियों का शोर हैबगावतों का शहर है…

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कुछ हिस्से उन मुलाकातों के…

कुछ हिस्से उन मुलाकातों केवो पीछे छोड़ गए थेउन्हें मैंने अलमारी मेंसंजोकर रखा हैजब किसी रातउनकी कमी खलती हैऔर यादें छेड़तीं हैंउन्ही टुकड़ो कोपलंग पर बिखेर देती हूँकभी उनमें उनकीझलक ढूंढती हूँतो कभीउन खामोशियों की चादर सेकुछ अधूरी हसरतों कोढांक देती हूँ

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Micropoetry#72

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Micropoetry#69

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Micropoetry#68

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ऐ जिंदगी…

पल दो पल ठहरकर कभी हमें भी तो देख जिंदगी तेरी मीठी शरारतों में घुलना बाकी है अभी… पल दो पल पलटकर कभी हमें भी तो देख जिंदगी तेरी नमकीन मस्तियों को चखना बाकी है अभी… पल दो पल मुस्कुराकर कभी हमें भी तो देख जिंदगी तेरी हसीन मधोशियों में बिखरना बाकी है अभी…

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आज रात फिर …

आज रात फिरदरवाजे परतुम्हारी यादोंने दस्तक दीघंटों वे ठहरे रहेकी कब हम उन्हेंभीतर लें, बतियाएंसारी रातचारपाई से लिपटेहमने उन्हें अनसूना कियासारी उम्रइन यादों नेआंखें नम ही तो की हैं

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कभी तो ऐसा हो …

कभी तो ऐसा होमैं कुछ न कहूँऔर तुम सुन लोमैं नज़रें चुराऊँऔर तुम देख लोमैं उम्मीदें छुपाऊँऔर तुम जान लोमैं हसरतें मिटाऊंऔर तुम पढ़ लोकभी तो ऐसा होमैं खुदको रोकूंऔर तुम पहचान लोमैं कतरा बिखरुंऔर तुम थाम लो

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नासमझी…

इश्क़ कुछ इस कदर हुआ उनसेउनकी गलतियां अपनी लगने लगींउनकी खामियां अच्छी लगने लगींउनकी नासमझी की हद तो देखियेवह हमें हीदोषी करार करअनजानों की तरहछोड़ चले ~~~~~ आशा सेठ

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रंगी हूँ तुझ में…

जैसे है पीला सूरज का नीला आकाश का हरा बरसात का सफ़ेद सर्दी का जैसे है भूरा धरती का नारंगी शूर का लाल प्रेम का काला झूठ का वैसे ही रंगी हूँ तुझ में सदा के लिए तेरे बिना मेरी पहचान क्या? तुझसे जुदा मेरा अस्तित्व क्या? ~~~~~ आशा सेठ

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Micropoetry#56

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Kuch Vo Pal: Book Review by Asha Seth

Hindi poets such as Gulzar, Kabir, Harivansh Rai Bachchan, Javed Akhtar, etc. have always influenced my thoughts in poetry. Their works have always inspired me. Rarely have I come across debut works in Hindi poetry from contemporary writers. So when I came across ‘Kuch Vo Pal’ on Blogadda, it intrigued me. Naturally, I wanted to…

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