आज इक अरसे बाद
हमने बालों को संवारा है
शायद आएं वो इस गली
ऐसा हवाओं में तराना है
बेसुध निगाहों को
काजल से निखारा है
शायद आएं वो इस गली
ऐसा राहों में अफसाना है
टूटे चुभते चूड़ियों को
कलाई से उतारा है
शायद आएं वो इस गली
दिशाओं में बोलबाला है
कुछ सजके कुछ संवरके
डूबते सूरज को निहारा है
शायद आएं वो इस गली
अब तो बस सांझ का सहारा है

