किस गली जाकर छुपूँ
की तेरी यादें पीछा करना छोड़ दें
हर नुक्कड़ पर इनका बसेरा है
हर चौराह इनका मेला भरा
रात ठहरूं चाहे जहाँ
सुबह इन्ही की बाहों में होती है
सोचता हूँ, मैं हूँ यहीं या
बस इनकी सिलवटों में गुम कहीं
तेरे जाने से जो गम न हुआ
वह इनकी साथ ने पूरा किया
टोली है यह बेहिसाब तन्हाइयों का
मेरी छत के नीचे इनके लिए जगह कहाँ
चाहता हूँ, दो पल तो इस कदर गुज़ारूं
तेरी यादें मुझसे मुँह मोड़ ले
एक शाम के लिए ही सही
वक़्त तेरी तरफदारी छोड़ दे
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आशा सेठ
