आते तो सब हैं यहाँ
साथ लेकर अनगीनत दिए
कुछ नन्हे ख़्वाब लिए
कुछ सीने में समंदर लिए
हैं सब तनहा यहाँ
अकेलों के मेले में
ढूंढते हैं कोई अपना
जो थामे हाथ अँधेरों में
भोर भई तो कस लिए
बख्तर बतौर बूते के
शाम जब उम्मीदें ढली
लिप्त हुए दरकारों में
एक चेहरे से दूसरा
यह दुविधा है पुश्तों की
इस शहर में हर कहीं
ज़िन्दगी है किश्तों की

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