नमस्कार पाठकों। हिंदी दिवस के इस शुभ अवसर पर, हम एक खास ब्लॉग पोस्ट लेकर आए हैं, जिसमें हम आपको बताएंगे कुछ ऐसी सर्वश्रेष्ठ हिंदी किताबें, जो आपके पठनीय सूची में होनी चाहिए।

हमारी भाषा, हिंदी, हमारी पहचान का हिस्सा है और इसका महत्व अत्यधिक है। इसलिए, इस ब्लॉग पोस्ट में हम आपको हिंदी साहित्य की दुनिया के उत्कृष्ट रचनाओं के बारे में जानकारी देंगे, जो हिंदी भाषा के प्रति आपकी गहरी स्नेहभावना को साझा करेंगी। हमारे साथ जुड़कर, आप हिंदी साहित्य का इस अद्वितीय सफर पर साथ चल सकते हैं, ताकि आप इस हिंदी दिवस पर इन किताबों का आनंद ले सकें।
कविता पाठकों के लिए ख़ास। वीडियो ज़रूर देखिए:
आइये, आगे बढ़कर हिंदी की सबसे लोकप्रिय किताबों की सूची देखें।

दो लोग
1946 का सर्दी का मौसम है। जब पार्टीशन की आसन्न होने की खबरें आती हैं, तो कैम्बलपुर गाँव से एक ट्रक निकलता है। इसमें वो लोग हैं जिन्हें यह नहीं पता कि वे कहाँ जाएँगे। उन्होंने ‘सीमा’ और ‘शरणार्थी’ जैसे शब्दों को अभी-अभी सुना है, और वे समझने की कोशिश कर रहे हैं कि एक रेखा खींचने से कैसे हिन्दुस्तान से पाकिस्तान को अलग किया जा सकता है। जब वे सीमा के पास पहुँचते हैं, कारवां बिखर जाता है और लोग अपने-अपने तरीके से आगे बढ़ते हैं। गुलज़ार की पहली उपन्यास इस ट्रक में सवार लोगों के जीवन का पीछा करता है, 1946 से लेकर कारगिल युद्ध तक। ‘टू’ एक ऐसा उपन्यास है जो पार्टीशन का आम आदमी के लिए क्या मतलब था, और यह भी एक ध्यानधारणा है कि भारत के विभाजन और उसके परिणामस्वरूप होने वाले महाक्षेप के बावजूद, एक बार चल रहे प्रक्रिया के तहत, यह हमेशा और निरंतर घटित हो रहा था, और जैसे-जैसे वो ट्रक से अपने घरों को छोड़कर निकले, वैसे-वैसे लोग कभी दूसरे घर नहीं पाए; वे एक जगह को ढूंढ़ते रहे, जिसे ‘घर’ कहा जा सके, जहाँ वे समाहित हो सकें।

झाँसी की रानी
‘झाँसी की रानी’ महाश्वेता देवी की प्रथम रचना है। इस पुस्तक को महाश्वेता जी ने कलकत्ता में बैठकर नहीं, बल्कि सागर, जबलपुर, पूना, इन्दौर-ललितपुर के जंगलों, झाँसी, ग्वालियर, कालपी में घटित तमाम घटनाओं यानी 1857-58 में इतिहास के मंच पर जो हुआ, उस सबके साथ-साथ चलते हुए लिखा। अपनी नायिका के अलावा लेखिका ने क्रान्ति के बाकी तमाम अग्रदूतों, और यहाँ तक कि अंग्रेज अफसरों तक के साथ न्याय करने का प्रयास किया है।
इस कृति में तमाम ऐसी सामग्री का पहली बार उद्घाटन किया गया है जिससे हिन्दी के पाठक सामान्यतः परिचित नहीं हैं। झाँसी की रानी पर अब तक लिखी गईं अन्य औपन्यासिक रचनाओं से यह उपन्यास इस अर्थ में भी अलग है कि इसमें कथा का प्रवाह कल्पना के सहारे नहीं बल्कि तथ्यों और दस्तावेजों के सहारे निर्मित किया गया है, जिसके कारण यह उपन्यास जीवनी के साथ-साथ इतिहास का आनन्द भी प्रदान करता है।

मंटो की सदाबहार कहानियां
सआदत हसन मंटो 1912 – 1955 मंटो उन लेखकों में हैं, जिन्होंने आदर्श और मर्यादा के नाम पर चलने वाले पाखण्ड को तार-तार कर दिया और | सामाजिक यथार्थ को नंगी आँखों से देखना सिखाया। इसके चलते उनपर कई बार अश्लीलता के आरोप गले। इस बाबत छः मुक़दमें चले। तीन अविभाजित भारत में और तीन पाकिस्तान में। लेकिन ये आरोप साबित नहीं हुए। टोबाटेक सिंह, बू, काली शलवार, खोल दो जैसी कहानियों ने न सिर्फ़ उर्दू बल्कि हिंदी कथा साहित्य को भी प्रभावित किया। उन्हें कहानियों के अतिरिक्त रेडियो और फिल्म पटकथा लेखन के लिए भी याद किया जाता है।

लिहाफ
इस किताब में उनकी सत्रह एक से एक कहानियाँ शामिल हैं जिनमें प्रसिद्ध लिहाफ भी है। इसमें उन्होंने समलैंगिकता को उस व$क्त अपना विषय बनाया था जब समलैंगिकता के आज जवान हो चुके पैरोकार गर्भ में भी नहीं आए थे। और इतनी खूबसूरती से इस विषय को पकडना तो शायद आज भी हमारे लिए मुमकिन नहीं है। उनकी सोच की ऊँचाई के बारे में जानने के लिए सिर्फ इसी को पढ़ लेना काफी है।

मधुशाला
हरिवंशराय ‘बच्चन’ की अमर काव्य-रचना मधुशाला 1935 से लगातार प्रकाशित होती आ रही है। सूफियाना रंगत की 135 रुबाइयों से गूँथी गई इस कविता क हर रुबाई का अंत ‘मधुशाला’ शब्द से होता है। पिछले आठ दशकों से कई-कई पीढि़यों के लोग इस गाते-गुनगुनाते रहे हैं। यह एक ऐसी कविता है] जिसमें हमारे आसपास का जीवन-संगीत भरपूर आध्यात्मिक ऊँचाइयों से गूँजता प्रतीत होता है।
मधुशाला का रसपान लाखों लोग अब तक कर चुके हैं और भविष्य में भी करते रहेंगे] लेकिन यह ‘कविता का प्याला’ कभी खाली होने वाला नहीं है, जैसा बच्चन जी ने स्वयं लिखा है-
भावुकता अंगूर लता से खींच कल्पना की हाला, कवि साकी बनकर आया है भरकर कविता का प्याला; कभी न कण भर खाली होगा, लाख पिएँ, दो लाख पिएँ! पाठक गण हैं पीनेवाले, पुस्तक मेरी मधुशाला।

चन्द्रकान्ता
‘चन्द्रकान्ता’ (सन् १८८८) को मूलतः और प्रमुखतः एक प्रेम-कथा कहा जा सकता है। चार हिस्सों में विभाजित इस उपन्यास की कथा अनायास ही हमें मध्यकालीन प्रेमाख्यानक काव्यों का स्मरण कराती है। इस प्रेम-कथा में अलौकिक और अतिप्राकृतिक तत्त्वों का प्रायः अभाव है और न ही इसे आध्यात्मिक रंग में रंगने का ही प्रयास किया गया है। यह शुद्ध लौकिक प्रेम-कहानी है, जिसमें तिलिस्मी और ऐयारी के अनेक चमत्कार पाठक को चमत्कृत करते हैं। नौगढ़ के राजा सुरेन्द्रसिंह के पुत्र वीरेन्द्रसिंह तथा विजयगढ़ के राजा जयसिंह की पुत्री चन्द्रकान्ता के प्रणय और परिणय की कथा उपन्यास की प्रमुख कथा है। इस प्रेम कथा के साथ-साथ ऐयार तेजसिंह तथा ऐयारा चपला की प्रेम–कहानी भी अनेकत्र झलकती है।

पिंजर
पिंजर यानी कंकाल। न कोई आकृति, न सूरत, न मन, न मर्ज़ी, बस कंकाल। ‘पिंजर’ आज़ादी के दौर के भारत की कहानी है। उस हिस्से की, जो हिंदुस्तान से कटकर पाकिस्तान बना। पिंजर में स्त्री की पीड़ा है, वेदना है, संताप है, त्याग है और ममत्व है। साथ में मर्दों के अपराध हैं और पश्चात्ताप भी। हिंदू हैं, मुसलमान हैं। विभाजन का दंश है। धर्मांधता के विरुद्ध खड़े मानवीय मूल्य हैं, जिनके सहारे अंत में वर्तमान के यथार्थ को कुबूल कर उपन्यास की नायिका सबके गुनाह माफ करती है और फिर से जिंदा हो उठती है, भविष्य की अनंत संभावनाओं के साथ|

नौकर की कमीज
नौकर की कमीज भारतीय जीवन के यथार्थ और आदमी की कशमकश को प्रस्तुत करनेवाला उपन्यास है। इस उपन्यास की सबसे बड़े खासियत यह है कि इसके पात्र मायावी नहीं बल्कि दुनियावी हैं, जिनमें कल्पना और यथार्थ के स्वर एकसाथ पिरोए हुए हैं। कहीं भी ऐसा नहीं लगता कि किसी पात्र को अनावश्यक रूप से महत्त्व दिया गया हो। हर पैरे और हर पात्र की अपनी महत्ता है। केन्द्रीय पात्र संतू बाबू एक ऐसा दुनियावी पात्र है जो घटनाओं को रचता नहीं बल्कि उनसे जूझने के लिए विवश है और साथ ही इस सोसाइटी के हाथों इस्तेमाल होने के लिए भी। आज की ‘ब्यूरोक्रेसी’ और अहसानफ़रामोश लोगों पर यह उपन्यास सीधा प्रहार ही नहीं करता बल्कि छोटे-छोटे वाक्यों के सहारे व्यंग्यात्मक शैली में एक माहौल भी तैयार करता चलता है।

चौरासी
‘चौरासी’ नामक यह उपन्यास सन 1984 के सिख दंगों से प्रभावित एक प्रेम कहानी है। यह कथा नायक ऋषि के एक सिख परिवार को दंगों से बचाते हुए स्वयं दंगाई हो जाने की कहानी है। यह अमानवीय मूल्यों पर मानवीय मूल्यों के विजय की कहानी है। यह टूटती परिस्थियों मे भी प्रेम के जीवित रहने की कहानी है। यह उस शहर की व्यथा भी है जो दंगों के कारण विस्थापन का दर्द सीने में लिए रहती है। यह वक़्त का एक दस्तावेज़ है।

रेत-समाधि
अस्सी की होने चली दादी ने विधवा होकर परिवार से पीठ कर खटिया पकड़ ली। परिवार उसे वापस अपने बीच खींचने में लगा। प्रेम, वैर, आपसी नोकझोंक में खदबदाता संयुक्त परिवार। दादी बजि़द कि अब नहीं उठूँगी। फिर इन्हीं शब्दों की ध्वनि बदलकर हो जाती है अब तो नई ही उठूँगी। दादी उठती है। बिलकुल नई। नया बचपन, नई जवानी, सामाजिक वर्जनाओं-निषेधों से मुक्त, नए रिश्तों और नए तेवरों में पूर्ण स्वच्छन्द। हर साधारण औरत में छिपी एक असाधारण स्त्री की महागाथा तो है ही रेत-समाधि, संयुक्त परिवार की तत्कालीन स्थिति, देश के हालात और सामान्य मानवीय नियति का विलक्षण चित्रण भी है। और है एक अमर प्रेम प्रसंग व रोज़ी जैसा अविस्मरणीय चरित्र। कथा लेखन की एक नयी छटा है इस उपन्यास में।

गुनाहों का देवता
इस आदर्श विश्वविद्यालय शहर में, युवा महिलाएँ घास पर लेटकर बादलों की ओर देखती रहती थीं और सपनों में खो जाती थीं। युवा पुरुष अल्फ्रेड पार्क में सुबह की सैर पर जाते थे। गर्मी के दिनों में शरबत पीने और तरबूज़ खाने का समय था, और शाम को कविता पढ़ने का समय था। यह एक समय भी था जब सामाजिक नियमों का दबाव महसूस होता था, और प्यार एक प्राप्त करने का दुर्लभ आदर्श था जिसे बहुत कम ही लोगों ने अनुभव किया। 1940 के अलाहाबाद ने चंद्र की अपनी प्रोफेसर की बेटी सुधा के प्रति उनके प्यार की तरंगों के बीच शांतिपूर्ण वातावरण का निरीक्षण किया। अपने प्यार की पवित्रता में गहरे विश्वास के प्रेरित, चंद्र ने सुधा से किसी और पुरुष से विवाह करने के लिए समझाया, जिसके परिणामस्वरूप भयानक परिणाम होते हैं। सुधा से दूर होने के बाद चंद्र को पाम्मी नामक आकर्षक से एक हानिकारक संबंध में धकेल दिया जाता है। इसके बाद की घातक परिणामों के साथ, चंद्र सुधा से दूर हो जाते हैं और प्यार को समझने की बेचैनी में डूबते हैं – क्या यह वाकई शारीरिक संबंधों के बारे में है? क्या प्यार की पवित्रता एक झूठ है? चंद्र पाम्मी के संग एक नाशास्पद संबंध में गिरते हैं। अपने प्रकाशित होने के बाद भी इसका बहुत बड़ा प्रचलन है, ‘चंद्र और सुधा’ अपने ताजगी से भरपूर प्यार और दिल को छू लेने वाले दु:खद दु:खों का मिश्रण के साथ पाठकों को लुभाती रही है।

चाँद पागल है
राहत एक अरबी लफ़्ज है। इसका एक अर्थ आराम भी है, लेकिन राहत इन्दौरी ने इस आराम को बेआराम बनाकर अपनी शायरी की बुनियादें रखी हैं। उनके यहाँ ये बेआरामी जाती कम, कायनाती ज्यादा है। उनकी इस कायनात का रकबा काफी फैला हुआ है। इसमें मुल्की ग़म भी है और मुल्क के बाहर के सितम भी हैं। ऐसा नहीं है कि उनकी अपनी बातों से उनकी ग़ज़ल यहीं तक सीमित नहीं है। उनकी होशमंदी ने उन्हें जीते-जागते समाज का एक सदस्य बनाकर इस सीमित दायरे को फैलाया भी है और शायरी को अपने सामय का आईना भी बनाया है। इस आईने में जो परछाइयाँ चलती-फिरती नज़र आती हैं, वो ऐसा इतिहास रचती महसूस होती हैं, जो सामाजिक उतार-चढ़ाव में शरीक होकर आम लफ़्जों में ढली हैं। राहत इन्दौरी इतिहास को अपी ग़ज़लों के माध्यम से स्टेज पर अपनी ड्रामाई प्रस्तुति से सुनाते भी हैं और श्रोताओं को चौंकाते भी हैं।

गोदान
प्रेमचंद का अंतिम व् महत्वपूर्ण उपन्यास गोदान क शासन के अंतर्गत किसान के महाजनी व्यवस्था में चलने वाले निरंतर शोषण तथा उससे उत्पन्न संत्रास कथा है. तत्कालीन भारत की सामाजिक, राजनितिक एवं आर्थिक परिस्तिथियों को तथा उस समय के गरीबों पर हो रहे शोषण को उजागर करने वाला यह उपन्यास मुंशी प्रेमचंद का अंतिम पूर्ण उपन्यास है I गोदान का नायक होरी एक किसान है जो किसान वर्ग के प्रतिनिधि के तौर पर मौजूद है. होरी और उसके परिवार के अन्य सदस्यों जैसे धनिया, रूपा, सोना, गोबर और झुनिया की कहानी सुनाने वाला ये उपन्यास जातिवाद और पूंजीवाद जैसी अनेक समस्याओं तथा उनके गरीब नागरिकों पर पड़ने वाले प्रभाव को भी दर्शाता है. यह सिर्फ़ होरी की कहानी नहीं बल्कि उस काल के हर भारतीय किसान की कथा है.

देवदार के फूल
क्या आप भी अक्सर उन चीज़ों की तलाश में होते हैं जिनका अस्तित्व है ही नहीं? और ज़िन्दगी इसी कश्मकश में गुज़ार देते हैं कि वो होता तो कैसा होता? तो यह कविता संग्रह आपके लिए है। कुछ ऐसे ही मार्मिक पलों को अपनी कविताओं में क़ैद किया है, कवियत्री आशा सेठ ने। इस संग्रह में आप पाएँगे आत्मविश्लेषण में घुली शामें तो पुरानी यादों को टटोलती रातें, खोये हुए लम्हों में ग़ुम सुकून तो कुछ रिश्तों के लिए त्यागा हुआ गुरूर। यह कविताएँ पाठक के चित्त में प्रेरणा, सब्र और सकारात्मकता जैसी भावनाएँ जगाती हैं और जीने का एक नया अंदाज़ पेश करती हैं। यह कविता संग्रह उन सबकी आवाज़ है जो गिरकर उठना जानते हैं, कुछ खोकर भी ख़ुश रहना जानते हैं, जो एकाकी में भी संपूर्ण हैं, सक्षम हैं।
दोस्तों, ये हमारी कुछ सबसे पसंदीदा और सबसे लोकप्रिय हिंदी किताबें हैं। हमने विभिन्न हिंदी साहित्य शृंगार और महान हिंदी साहित्य लेखकों को आपके अन्वेषण के लिए शामिल किया है। आशा है कि आप इन किताबों को पढ़ेंगे।
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